1st PUC Hindi Workbook Answers अपठित गद्यांश

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Karnataka 1st PUC Hindi Workbook Answers अपठित गद्यांश

निम्नलिखित अनुच्छेद पढ़कर उस पर आधारित प्रश्नों के उत्तर लिखिएः

१) “ऐतिहासिक नगरी आगरा के निकट सतत प्रवाहिनी नीली-धारा वाली यमुना के दाहिने तट पर ताजमहल स्थित है। बादशाह शाहजहाँ ने इसे अपनी बेगम मुमताज की स्मृति में बनवाया था। अपने पति से बेगम ने इस संसार से बिदा लेते समय निवेदन किया था कि, ‘मेरी मृत्यु होने पर एक ऐसा मकबरा बनवाना जो संसार में सबसे सुंदर एवं स्थायी हो।’ बादशाह ने अपनी प्राणेश्वरी की अंतिम आकांक्षा की पूर्ति का भरसक प्रयास किया। इसमें उनको सफलता भी मिली। ताजमहल संसार के सात आश्चर्यों में से एक है। वर्षों के बाद भी वह अपने यथावत् रूप में दर्शकों के मन को मोह रहा है। सैकड़ों कारीगरों एवं मजदूरों के निरंतर बीस वर्ष के परिश्रम का परिणाम यह ताजमहल है। इसके बनवाने में बाईस करोड़ रुपया खर्च हुआ था।”

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प्रश्नः
क) ताजमहल किस नगर में स्थित है?
ताजमहल आगरा नगर में स्थित है।

ख) ताजमहल को किसने बनवाया?
ताजमहल को शाहजहाँ ने बनवाया।

ग) ताजमहल को किसकी अंतिम आकांक्षा की पूर्ति के लिए बनवाया गया?
ताजमहल को बादशाह शाहजहाँ ने अपनी बेगम मुमताज की आकांक्षा की पूर्ति के लिए बनवाया था।

घ) ताजमहल के निर्माण में कितने वर्ष लगे?
ताजमहल के निर्माण में बीस वर्ष लगे।

ङ) ताजमहल को बनवाने में कितने रुपये खर्च हुए?
ताजमहल को बनवाने के लिए बाइस करोड़ रुपये खर्च हुए।

२) ईश्वर ने संसार के सारे रहस्य प्रकृति में छिपा कर रख दिये थे। मनुष्य ने अपने परिश्रम और प्रयत्न से उन रहस्यों पर से पर्दा उठा दिया। यह कहना गलत है कि मनुष्य संसार में अपना भाग्य लेकर आता है: वास्तव में वह अपने भाग्य का स्वयं निर्माता है जो वह अपनी मेहनत से बनाता है। प्रकृति मनुष्य के भाग्य से डर कर नहीं बल्कि इसके परिश्रम से हार मानती है। जो लोग भाग्य पर विश्वास करते हैं, वे आलसी हैं। वास्तव में वीर और परिश्रमी व्यक्ति अपना भाग्य स्वयं बनाता है।

प्रश्नः
क) ईश्वर ने संसार के सारे रहस्य किसमें छिपाकर रख दिये थे?
ईश्वर ने संसार के सारे रहस्य प्रकृति में छिपाकर रख दिये थे।

ख) किसने अपने परिश्रम और प्रयत्न से रहस्यों पर से पर्दा उठा दिया?
मनुष्य ने अपने परिश्रम और प्रयत्न से रहस्यों से पर्दा उठा दिया।

ग) प्रकृति किससे हार मानती है?
प्रकृति मनुष्य के परिश्रम से हार मानती है।

घ) भाग्य पर विश्वास करनेवाले लोग कैसे होते हैं?
भाग्य पर विश्वास करनेवाले लोग आलसी हैं।

ङ) अपने भाग्य का निर्माता कौन है?
परिश्रमी व्यक्ति अपने भाग्य का निर्माता स्वयं है।

अतिरिक्त प्रश्नः

1) गंगा का हमारे देश के लिए बहुत अधिक महत्व है। गंगा नदी तीन राज्यों में से होकर गुजरती है। वे हैं उत्तर प्रदेश, बिहार और बंगाल। भारत के इस मध्यम भाग को ‘गंगा का मैदान’ कहा जाता है। यह प्रदेश अत्यधिक उपजाऊ, संपन्न तथा हरा-भरा है जिसका श्रेय गंगा को ही है। इन राज्यों में कृषि उपज से संबंधित तथा कृषि पर आधारित अनेक उद्योग-धंधे भी फैले हुए हैं जिनसे लाखों लोगों की जीविका तो चलती ही है, राष्ट्रीय आय में वृद्धि भी होती है। पेयजल भी गंगा तथा उसकी नहरों के माध्यम से ही प्राप्त होता है। यदि गंगा न होती तो हमारे देश का एक महत्वपूर्ण भाग बंजर तथा रेगिस्तान होता। इसीलिए गंगा उत्तर भारत की सबसे पवित्र तथा महत्वपूर्ण नदी है। गंगा नदी भारतीय संस्कृति का भी अभिन्न अंग है। भारत के प्राचीन ग्रंथों जैसे वेद, पुराण, महाभारत आदि में गंगा की पवित्रता का वर्णन है। भारत के अनेक तीर्थ गंगा के किनारे पर ही स्थित हैं।

प्रश्नः
1) भारत के किस भाग को गंगा का मैदान कहा जाता है और क्यों?
2) गंगा के मैदान की क्या विशेषता है?
3) इस गद्यांश के लिए उपयुक्त शीर्षक दीजिए।
4) गंगा भारतीय संस्कृति से कैसे जुड़ी है?
5) यदि गंगा न होती तो क्या होता?
उत्तरः
1) भारत के मध्यम भाग को ‘गंगा का मैदान’ कहा जाता है। इसका कारण यह इलाका अत्यधिक उपजाऊ, संपन्न तथा हरा भरा है।
2) इस इलाके में कृषि उपज से संबंधित तथा कृषि पर आधारित अनेक उद्योग-धन्धे फैले – हुए हैं। लाखों लोगों की इससे जीविका चलती है। राष्ट्रीय आय में वृद्धि होती है।
3) ‘जीवनदायिनी गंगा’।
4) भारत के प्राचीन ग्रंथों जैसे वेद, पुराण, महाभारत आदि में गंगा की पवित्रता का वर्णन है। अनेक तीर्थ गंगा के किनारे पर स्थित हैं।
5) यदि गंगा न होती तो हमारे देश का एक महत्वपूर्ण भाग बंजर तथा रेगिस्तान होता।

2) संसार में तीन बातें बड़ी महत्वपूर्ण होती है। इनको प्राप्त करके तुम संसार के किसी भी कोने में जाओगे, तो अपना निर्वाह कर सकोगे। ये तीन बातें हैं – अपनी आत्मा का, अपने आप का और ईश्वर का सच्चा ज्ञान प्राप्त करना। इनका मतलब यह नहीं कि तुम्हें अक्षर ज्ञान नहीं मिलेगा। वह तो मिलेगा ही। लेकिन तुम उसकी चिंता करो, यह मैं नहीं कहता। इसके लिए तुम्हारे पास अभी बहुत समय है। अक्षर-ज्ञान तो इसलिए होता है कि जो कुछ तुम्हें मिला है, उसे तुम दूसरों को दे सको। इतना और याद रखना कि अब से हमें गरीबी में रहना है। जितना अधिक मैं विचार करता हूँ, उतना ही अधिक मुझे लगता है कि गरीबी में ही सुख है। इसलिए मेरी इच्छा है कि अपने परिवार में तुम एक योग्य किसान बनो। अक्षर-ज्ञान में गणित और संस्कृत पर पूरा ध्यान रखना। भविष्य में संस्कृत तुम्हारे लिए बहुत उपयोगी सिद्ध होगी। ये दोनों विषय बड़ी उम्र में सीखना कठिन है।

प्रश्नः
1) उपर्युक्त गद्यांश में किन तीन महत्वपूर्ण बातों की चर्चा की गई है?
2) लेखक के अनुसार ‘अक्षर-ज्ञान’ का क्या उद्देश्य है?
3) लेखक अपने पुत्र को योग्य किसान बनने की सलाह क्यों दे रहा है?
4) अक्षर-ज्ञान में कौन सी दो विषयों का ध्यान रखना है?
5) इस गद्यांश के लिए उपयुक्त शीर्षक दीजिए।
उत्तर:
1) अपनी आत्मा का, अपने आप का और ईश्वर का सच्चा ज्ञान प्राप्त करना – इन तीन महत्वपूर्ण बातों की चर्चा की गई है।
2) ‘अक्षर-ज्ञान’ इसलिए होता है कि हम उसे दूसरों को भी दे सकें।
3) गरीबी में ही सुख है। इसलिए लेखक अपने पुत्र को किसान बनने की सलाह दे रहा है।
4) अक्षर-ज्ञान में संस्कृत और गणित का पूरा ध्यान रखना है।
5) ‘अक्षर-ज्ञान’।

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3) हमारी खराबी का स्रोत कहाँ है – इसका पता हमें लगाना चाहिए और वहीं से उसे ठीक करने का प्रयत्न करना चाहिए। स्रोत वहीं हो सकता है, जहाँ से हमारा जीवन प्रारंभ होता है और वह है हमारा घर। हमारे घर की इस समय बड़ी दुर्व्यवस्था है। अवश्य ही आप लोगों को अपने घर में असंतोष होगा। असंतोष इसी कारण हो सकता है कि अपने घर में कुछ दोष आप पाते हैं परंतु दोष की कुछ जिम्मेदारी आपके ऊपर भी तो है। ऐसी स्थिति में आपका कर्तव्य है कि आप इन दोषों को दूर करने का यत्न करें। सबके भावों का आदर करते हुए आपको ऐसा प्रयास करना होगा कि आपके कारण किसी दूसरे को कष्ट न हो। इससे घर की शांति और सौहार्द में वृद्धि होगी। आजकल की सबसे विचित्र बात यह है कि कोई अपने को दोष नहीं देता, सब कोई दूसरे को दोष देते हैं। आज के संसार में आपकी बड़ी जिम्मेदारी है। आगे का भारत वैसा ही होगा जैसा आप लोग अपने जीवन से उसे बनाएँगे। यदि आप अपना काम ठीक तरह से करते हैं तो आप सब देशभक्त हैं और यदि अपने काम के प्रति उदासीन हैं तो आप वास्तव में देशद्रोही हैं।

प्रश्नः
1) लेखक द्वारा ‘घर’ को खराबी का स्रोत बताए जाने का क्या कारण है?
2) आज के युवकों को अपने घर के प्रति असंतोष क्यों है?
3) घर में शांति एवं सौहार्द की वृद्धि करने के लिए लेखक ने क्या सुझाव दिया है?
4) लेखक ने वक्तव्य में किसे देशद्रोही कहा है?
5) उपर्युक्त गद्यांश का उचित शीर्षक दीजिए।
उत्तरः
1) घर से ही हमारा जीवन प्रारंभ होता है। इसलिए लेखक ने ‘घर’ को खराबी का स्त्रोत बताया है।
2) घर की दुर्व्यवस्था के कारण, युवकों में घर के प्रति असंतोष है।
3) लेखक ने सुझाव दिया है कि हमें घर में सबके भावों का आदर करते हुए ऐसा प्रयास करना होगा कि आपके कारण किसी को कष्ट न हो। इससे घर में शांति और सौहार्द की वृद्धि होगी।
4) यदि आप अपने काम के प्रति उदासीन हैं
5) ‘घर की दुर्व्यवस्था’।

4) हमारे समाज में बहुत से लोग भाग्यवादी होते हैं और सब कुछ भाग्य के सहारे छोड़कर कर्म में विरत हो बैठते हैं। ऐसे व्यक्ति ही समाज को प्रगति के पथ पर अग्रसर नहीं होने देते।,आज तक किसी भाग्यवादी ने संसार में कोई महान कार्य नहीं किया। बड़ी-बड़ी खोजें, बड़े-बड़े आविष्कार और बड़े-बड़े निर्माण के कार्य श्रम के द्वारा ही पहुँचते हैं। जब हम परिश्रम से अपने कर्तव्य का पालन करते हैं, तो हमारे मन को अलौकिक आनंद मिलता है। ऐसे व्यक्ति को धर्म के बाह्याचारों के अनुसरण की आवश्यकता नहीं होती; उसका परिश्रम ही उसकी पूजा है। यदि हम अपने कार्य में ईमानदारी से श्रम नहीं करते, तो हमारे मन में एक प्रकार का भय समाया रहता है। कभी-कभी तो हम ग्लानि का भी अनुभव करते हैं।

प्रश्नः
1) भाग्यवादी व्यक्तियों का समाज की प्रगति पर क्या प्रभाव पड़ता है?
2) लक्ष्य प्राप्ति में साधन संपन्नता, प्रतिभा और श्रम का क्या योगदान होता है?
3) उपर्युक्त गद्यांश का उचित शीर्षक दीजिए।
4) ईमानदारी से काम न करने का हमारे हृदय पर क्या प्रभाव पड़ता है?
5) हमारे समाज में बहुत से लोग क्या होते हैं?
उत्तरः
1) भाग्यवादी व्यक्ति समाज को प्रगति के पथ पर अग्रसर नहीं होने देते हैं।
2) बड़ी-बड़ी खोजें, बड़े-बड़े आविष्कार और बड़े-बड़े निर्माण के कार्य श्रम के द्वारा ही होते हैं।
3) ‘श्रम का महत्व’।
4) ईमानदारी से काम नहीं करने पर हमारे मन में एक भय समाया रहता है।
5) हमारे समाज में बहुत से लोग भाग्यवादी होते हैं।

5) हिंदी भाषा को राष्ट्रभाषा का पद मिलना चाहिए, यह नारा अब बिना मौसम का नारा है। हिंदी को राष्ट्रभाषा बनना नहीं है, वह राष्ट्रभाषा है। आज वह भारत की प्रमुख राजभाषा है, अंग्रेजी का स्थान उसके सामने गौण है। इसी प्रकार जो हिंदी प्रेमी अति उत्साह या क्रोध में आकर यह कह बैठते हैं कि ‘अरे मैं हिंदी के लिए रक्त दूंगा’ – वे भी बिना मौसम की बात कर रहे हैं। हिंदी अब रक्त लेकर क्या करेगी? अब तो उसे पैसे और पसीने की ज़रूरत है। पैसे उनके लिए चाहिए जिनके लिए हिंदी की किताबें और अखबार निकालते हैं और पसीना उनको चाहिए जो हिंदी के लेखक, कवि और पत्रकार हैं और जिन पर यह जिम्मा है कि वे विश्वविद्यालय स्तर की सारी पढ़ाई हिंदी के माध्यम से करें और शीघ्र ही हिंदी को विद्या की ऐसी भाषा बना दें कि उसके जरिए भारतवासियों के मस्तिष्क का चरम विकास हो सके। पसीना आज उनका भी चाहिए जो हिंदी जानते हैं और केंद्रीय या प्रांतीय सरकारों के दफ्तरों में काम कर रहे हैं। अब उन्हें पूरी छूट है कि वे केंद्रीय शासन के अधीन होने पर भी, यदि चाहें तो हिंदी में काम कर सकते हैं। यह स्वतंत्रता मिल जाने पर भी यदि वे हिंदी में काम करने से मुकरते हैं, तो उनकी देशभक्ति की भावना अधूरी है।

प्रश्नः
1) सरकारी दफ्तरों में कार्य करने वाले अपनी देशभक्ति का परिचय किस प्रकार दे सकते हैं?
2) ‘अब तो हिंदी को पैसे और पसीने की जरूरत है’ – इस पंक्ति से लेखक का क्या आशय है?
3) लेखकों, कवियों और पत्रकारों पर आज क्या उत्तरदायित्व है?
4) भारत की प्रमुख राजभाषा कौन सी है?
5) उपर्युक्त गद्यांश का उचित शीर्षक दीजिएं।
उत्तरः
1) सरकारी दफ्तरों में काम करनेवाले चाहें तो हिन्दी में काम करके अपनी देशभक्ति का परिचय दे सकते है।
2) हिन्दी समझने वाले, पढ़ने वाले वर्ग के लिए नौकरी एवं जो लोग हिन्दी की नौकरी कर रहे हैं उनकी मेहनत अर्थात पसीने की जरूरत है।
3) हिन्दी के लेखक, पत्रकार एवं कवियों पर जिम्मेदारी है कि वे विश्वविद्यालय स्तर की पढ़ाई हिन्दी के माध्यम से करें। 4) भारत की प्रमुख राजभाषा हिन्दी है।
5) ‘राजभाषा हिन्दी’।

6) मानव जीवन में कितनी संभावनाएँ छिपी हैं, इसकी कोई सीमा नहीं है। पशु से लेकर देवत्व तक की सारी सीढ़ियाँ मानवीय चोले में से होकर गुजरती है। शर्त एक ही है – उसके लिए चुनौती चाहिए। बिना चुनौती के वे सारी संभावनाएँ सोई रहती हैं। संसार में जितने भी पैगंबर या अवतार हुए हैं, वे सब अपने-अपने समय की चुनौतियों के उत्तर हैं। हरेक युग की अपनी चुनौतियाँ होती हैं, जन सामान्य इन चुनौतियों को न तो पहचान पाता है, न उनका सामना करने की सामर्थ्य जुटा पाता है। पर जो तेजस्वी पुरुष उन चुनौतियों को पहचान कर उनका उत्तर देने के लिए मैदान में कूद पड़ता है लोग उसे ‘महापुरुष’ कहकर स्वयं उसका अनुगमन करने को तैयार हो जाते हैं। संसार में ज्ञान-विज्ञान की जितनी भी उन्नति हई है. उन सबके मल में भी वही चुनौतियों वाली बात है। मनुष्य के मन में कुछ प्रश्न पैदा होते हैं, उन प्रश्नों का उत्तर देने के लिए वह अपनी बुद्धि का प्रयोग करता है। .. फिर कुछ नए प्रश्न पैदा होते हैं, वह फिर उनका उत्तर देने का प्रयत्न करता है – और यों ज्ञान-विज्ञान की दृष्टि से मानव-कोश में वृद्धि होती चली जाती है।

प्रश्नः
1) मानव जीवन में चुनौतियों का क्या महत्व है?
2) उपर्युक्त गद्यांश का उचित शीर्षक दीजिए।
3) ‘सामान्य पुरुष’ और ‘तेजस्वी पुरुष’ में क्या अंतर होता है?
4) ज्ञान-विज्ञान की दृष्टि से मानव-कोश में किस प्रकार वृद्धि होती रहती है?
5) किसके बिना सारी संभावनाएँ सोई रहती है?
उत्तरः
1) चुनौतियाँ ही मनुष्य जीवन की अनंत संभावनाओं को सामने लाती हैं। चुनौतियाँ ही महापुरुषों एवं पैगम्बरों को सामने लाती हैं।
2) ‘चुनौतियाँ एवं मानव जीवन’।
3) ‘सामान्य पुरुष’ न तो चुनौती को पहचान पाता है और न ही हिम्मत जुटा पाता है लेकिन “तेजस्वी पुरुष’ उन चुनौतियों को पहचानकर उसका सामना करता हैं।
4) मनुष्य के सामने जो प्रश्न पैदा होते हैं, उन प्रश्नों का वह अपनी बुद्धि से उत्तर देता है। इस प्रकार ज्ञान-विज्ञान की दृष्टि से मानव-कोश में वृद्धि होती है।
5) चुनौती के बिना सारी संभावनाएँ सोई रहती है।

7) विद्यार्थियों की अनुशासनहीनता का मुख्य कारण माता-पिता की ढिलाई है। माता-पिता के संस्कार ही बच्चे पर पड़ते हैं। बच्चे की प्राथमिक पाठशाला घर होता है। उसके संस्कार घर में से ही खराब हो जाते हैं। पहले तो प्यार के कारण माता-पिता कुछ करते नहीं; वह जहाँ बैठे और जहाँ चाहे खेले, जो मन में आए वह करे। पर जब हाथी के दाँत बाहर निकल आते हैं, तो उन्हें चिंता होती है, फिर वे अध्यापकों की आलोचना करना आरंभ कर देते हैं। दूसरा कारण आज की अपनी शिक्षा प्रणाली है जिसमें नैतिक या चारित्रिक शिक्षा को कोई स्थान नहीं दिया जाता। पहले विद्यार्थियों को दंड का भय बना रहता था पर अब आप विद्यार्थियों को हाथ नहीं लगा सकते क्योंकि शारीरिक दंड अपराध है। केवल जबानी जमा खर्च कर सकते हैं। इसमें विद्यार्थी बहुत तेज होता है, आप एक कहेंगे, वह आपको चार सुनाएगा। पश्चिमी संगीत, नृत्य तथा चलचित्रों ने भी विद्यार्थियों का बिगड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। इनके कारण उनमें चरित्रहीनता, उच्छृखलता इस हद तक बढ़ती जा रही है कि यदि समय रहते इस ओर ध्यान नहीं दिया गया, तो देश का भविष्य ही अंधकारपूर्ण हो जाएगा।

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प्रश्नः
1) माता-पिता की ढिलाई किस प्रकार विद्यार्थियों को अनुशासनहीन बनाती है?
2) ‘पर जब हाथी के दाँत निकल आते हैं, तो उन्हें चिंता होती है’ पंक्ति का क्या आशय है?
3) आज की शिक्षा प्रणाली अनुशासनहीनता को किस प्रकार बढ़ावा देती है?
4) उपर्युक्त गद्यांश का उचित शीर्षक दीजिए।।
5) वर्तमान विद्यार्थियों में क्या हद तक बढ़ती जा रही है?
उत्तरः
1) माता-पिता के प्यार के कारण, नहीं डाँटने के कारण बच्चे अनुशासनहीन हो जाते हैं।
2) ‘बच्चे जब बड़े होकर बिगड़ जाते है। इसके लिए यह पंक्ति कही गई है।
3) आज की शिक्षा प्रणाली में नैतिक या चारित्रिक शिक्षा को कोई महत्व नहीं दिया जाता। अब बच्चों को दंड भी नहीं दिया जा सकता। इस तरह की शिक्षा व्यवस्था ही अनुशासनहीनता को बढ़ावा देती है।
4) ‘अनुशासन का महत्व’।
5) वर्तमान विद्यार्थियों में चरित्रहीनता, उच्छृखलता हद तक बढ़ती जा रही है।

8) हमारी संस्कृति में मानव जीवन के चार उद्देश्य बताए गए हैं – धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष। जीवन के इन उद्देश्यों को स्वस्थ शरीर द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है। जब व्यक्ति स्वयं सुखी एवं संतुष्ट होता है, तो दूसरों को भी सुखी बनाने का प्रयास करता है तथा समाज एवं राष्ट्र के लिए कुछ कर पाने में समर्थ होता है। इसीलिए अच्छे स्वास्थ्य को महावरदान कहा गया है। जो व्यक्ति अच्छे स्वास्थ्य की उपेक्षा कर देता है, वह मानो अपने सभी सुखों की उपेक्षा कर रहा है। दुर्बल, रोगी तथा अशक्त मनुष्य न तो स्वयं की, न अपने परिवार की, न अपने राष्ट्र की और न ही मानवता की रेवा कर सकता है। इसलिए शरीर को पुष्ट, चुस्त एवं बलिष्ठ बनाना आवश्यक है। अस्वस्थ व्यक्ति घर बैठे अपनी दुर्बलता और असमर्थता पर नौ-नौ आँसू बहाया करते हैं जबकि स्वस्थ व्यक्ति असंभव को भी संभव में बदलने की क्षमता रखते हैं। इसीलिए प्रायः देखा गया है कि दुर्बल और अशक्त व्यक्ति निराशावादी और भाग्यवादी बन जाया करते हैं।

प्रश्नः
1) जीवन के चार उद्देश्य कौन-कौन से हैं तथा उन्हें किस प्रकार प्राप्त किया जा सकता है?
2) उपर्युक्त गद्यांश का उचित शीर्षक दीजिए।
3) राष्ट्र और मानवता की सेवा के लिए किस बात की सर्वाधिक आवश्यकता है?
4) किस प्रकार के व्यक्ति निराशावादी और भाग्यवादी बन जाते हैं और क्यों?
5) किसे महावरदान कहा गया है?
उत्तरः
1) जीवन के चार उद्देश्य – धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष हैं। इनको स्वस्थ शरीर के द्वारा प्राप्त किया जा सकता है।
2) ‘पहला सुख निरोगी काया’।
3) राष्ट्र और मानवता की सेवा के लिए मनुष्य को चुस्त, पुष्ट एवं बलिष्ठ बनना आवश्यक है।
4) दुर्बल और अशक्त व्यक्ति निराशावादी और भाग्यवादी बन जाते हैं।
5) अच्छे स्वास्थ्य को महावरदान कहा गया है।

9) सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ प्राणी मानव है। अतीत में एक समय था जब वह प्रायः पशु के समान ही था। दीर्घकालीन संघर्ष के पश्चात वह सर्वश्रेष्ठ बन सका। भीमकाय, बड़े भयंकर और अति-बलशाली पशुओं से संघर्ष था। मानव की विजय का कारण उसका शारीरिक बल उतना नहीं था जितना उसका बौद्धिक बल था। पशु अंतःप्रेरणा से एक सीमित क्षेत्र में ही काम करते हैं। उनमें जो परिवर्तन होता है, वह प्रकृति के कारण से होता है जबकि मानव अपनी बुद्धि का प्रयोग करके विस्तृत क्षेत्र में काम करता है। मानव की ‘जिज्ञासा वृत्ति’ भी उसे पशुओं से भिन्न करती है। प्रकृति के रहस्यों को खोजने, उन्हें उपयोग में लाकर जीवन को अधिक सुखमय बनाने तथा ज्ञान-विस्तार के मूल में उसकी ‘जिज्ञासा’ ही है, जिसका पशुओं में सर्वथा अभाव है। एक विशेष गुण मानव में और है, वह है – ‘सौंदर्यानुभूति’। सृष्टि के समस्त चराचरों में केवल मानव ही सुंदर और भद्दी वस्तुओं में भेद कर सकता है। अपने इस विवेक के कारण ही वह कलाकार बन सकता है तथा ललित कलाओं का विकास भी संभव हो पाया है।

प्रश्नः
1) मनुष्य को सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ प्राणी क्यों कहा जाता है?
2) मनुष्य और पशु में क्या अंतर है?
3) मनुष्य की ‘जिज्ञासा’ वृत्ति ने उसे क्या लाभ पहुँचाया है?
4) मानव में कौन सा विशेष गुण है?
5) उपर्युक्त गद्यांश का उचित शीर्षक दीजिए।
उत्तरः
1) बौद्धिक बल के कारण मनुष्य को सर्वश्रेष्ठ प्राणी कहा गया है।
2) पशु अंतःप्रेरणा से सीमित क्षेत्र में काम करते हैं जबकि मानव अपनी बुद्धि का प्रयोग करके विस्तृत क्षेत्र में काम करता है।
3) मनुष्य की जिज्ञासा वृत्ति ने प्रकृति के रहस्यों को खोजने, उन्हें उपयोग में लाकर जीवन को सुखमय बनाने तथा ज्ञान विस्तार में मदद की है।
4) मानव में विशेष गुण ‘सौंदर्यानुभूति’ है।
5) ‘मनुष्य एक सर्वश्रेष्ठ प्राणी’।

10) मुखिया किसे कहते हैं? मुखिया शब्द मुख से निकला है। जिस प्रकार मुख सब अंगों में श्रेष्ठ है और यदि वह काम करना बंद कर दे तो शरीर के सभी अंग निकम्मे हो जाएंगे, उसी प्रकार मुखिया भी एक पूज्य, सदाचारी, श्रेष्ठ, सज्जन पुरुष है। मुख के दो कार्य हैं खाना और बोलना। खाने और बोलने का एक समान द्वार है। सच्चा मुखिया वही है, जो सोच-विचार करके बोले और किसी का पैसा भी न खाए। बुद्धिमान मनुष्य वह है, जिसका मुख दिल में हो अर्थात् सोच करके बोले। मूर्ख वह है जिसका दिल मुख में हो अर्थात् जो उसके मुख में आए, वह कह दे। आप भी अगर शुभ संकल्प मन में धारण करोगे और अशुभ वचन मुख से न निकालोगे, सोच-समझकर चलोगे तो पौ-बारह हैं। आपसे स्वयं ही शुभ कार्य होते रहेंगे फिर तो आपका बाल भी बाँका न होगा। जिधर जाओगे उधर आपका यश होगा।

प्रश्नः
1) मुखिया और मुख में क्या समानता है?
2) सच्चे मुखिया में कौन-कौन से गुण होने चाहिए?
3) बुद्धिमान और मूर्ख मनुष्य में क्या अंतर है?
4) शुभ संकल्प करने से क्या फायदा होगा?
5) इस गद्यांश का उचित शीर्षक दीजिए।
उत्तरः
1) मुख सभी अंगों में श्रेष्ठ है। शरीर के सभी अंग उससे संचालित होते हैं। उसी तरह मुखिया भी एक पूज्य, सदाचारी, श्रेष्ठ सज्जन पुरुष है।
2) सच्चा मुखिया वही है जो सोच-विचार कर बोले। किसी का एक पैसा भी न खाए।
3) बुद्धिमान मनुष्य सोचकर बोलता है एवं मूर्ख मनुष्य बिना सोचे बोलता है।
4) शुभ संकल्प से हम सोच समझकर चलेंगे। हमसे स्वयं शुभ कार्य होते रहेंगे। जिधर जाएंगे उधर यश होगा।
5) ‘मुख और मुखिया’।

11) ‘वायु-प्रदूषण’ का सबसे अधिक प्रकोप महानगरों पर हुआ है। इसका कारण है बढ़ता हुआ औद्योगीकरण। गत बीस वर्षों में भारत के प्रत्येक नगर में कारखानों की जितनी तेजी से वृद्धि हुई है उससे वायुमंडल पर बहुत प्रभाव पड़ा है क्योंकि इन कारखानों की चिमनियाँ से चौबीसों घंटे निकलने वाले धुएँ ने सारे वातावरण को विषाक्त बना दिया है। इसके अलावा सड़कों पर चलने वाले वाहनों की संख्या में तेजी से होने वाली वृद्धि भी वायु-प्रदूषण के लिए पूरी तरह उत्तरदायी है। इन वाहनों के धुएँ से निकलने वाली ‘कार्बन मोनो आक्सा के कारण आज न जाने कितने प्रकार की साँस और फेफड़ों की बीमारियाँ आम बात हो गई हैं। इधर बढ़ती हुई जनसंख्या, लोगों का काम की तलाश में गाँवों से शहरों की ओर भागना भी वायु-प्रदूषण के लिए अप्रत्यक्ष रूप से उत्तरदायी है। शहरों की बढ़ती जनसंख्या के लिए आवास की सुविधाएँ उपलब्ध कराने के लिए वृक्षों और वनों को भी निरंतर काटा जा रहा है। वायु-प्रदूषण को बचाने वाले कारणों की हमें खोज करनी चाहिए। पर्यावरण की सुरक्षा के लिए अधिक से अधिक वृक्ष लगाने चाहिए।

प्रश्नः
1) वायु-प्रदूषण का सबसे अधिक प्रकोप महानगरों पर ही क्यों हुआ है?
2) सड़कों पर चलने वाले वाहन वायु-प्रदूषण में किस प्रकार वृद्धि करते हैं?
3) बढ़ती हुई जनसंख्या का पर्यावरण पर क्या प्रभाव पड़ा है?
4) पर्यावरण की रक्षा के लिए क्या किया जाना चाहिए?
5) उपर्युक्त गद्यांश का उचित शीर्षक दीजिए।
उत्तरः
1) शहरों में बढ़ते हुए औद्योगीकरण से वायु-प्रदूषण का सबसे ज्यादा प्रकोप हुआ है।
2) सड़को पर चलने वाले वाहन ‘कार्बन मोनो आक्साइड गैस’ छोड़ते है।
3) शहरों में बढ़ती जनसंख्या के कारण आवास की सुविधाएँ उपलब्ध करवाने के लिए वृक्षों एवं वनों को काटा जा रहा है।
4) पर्यावरण की सुरक्षा के लिए अधिक से अधिक वन लगाने चाहिए।
5) ‘शहरों में बढ़ता वायु-प्रदूषण’।

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12) साहित्य का आधार जीवन है। इसी नींव पर साहित्य की दीवार खड़ी होती है। उसकी अटारियाँ, मीनार और गुंबद बनते हैं। लेकिन बुनियाद मिट्टी के नीचे दबी पड़ी है। जीवन परमात्मा की सृष्टि है, इसलिए सुबोध है, सुगम है और मर्यादाओं से परिमित है। जीवन परमात्मा को अपने कामों का जवाबदेह है या नहीं हमें मालूम नहीं, लेकिन साहित्य तो मनुष्य के सामने जवाबदेह है। इसके लिए कानून है जिससे वह इधर-उधर नहीं जा सकता। मनुष्य जीवन पर्यंत आनंद की खोज में लगा रहता है। किसी को वह रत्न द्रव्य में मिलता है, किसी को भरे-पूरे परिवार में, किसी को लंबे-चौड़े भवन में, किसी को ऐश्वर्य में। लेकिन साहित्य का आनंद इस आनंद से ऊँचा है। उसका आधार सुंदर और सत्य है। वास्तव में सच्चा आनंद सुंदर और सत्य से मिलता है, उसी आनंद को दर्शाना, वही आनंद उत्पन्न करना साहित्य का उद्देश्य है।

प्रश्नः
1) साहित्य और जीवन का क्या संबंध है?
2) इस गद्यांश का उचित शीर्षक दीजिए।
3) साहित्य के आनंद का क्या आधार है?
4) साहित्य का क्या उद्देश्य है?
5) परमात्मा की सृष्टि का वर्णन किस प्रकार किया है?
उत्तरः
1) साहित्य का आधार ही जीवन है। इसी की नींव पर साहित्य की दीवार खड़ी होती है।
2) ‘साहित्य और जीवन’।
3) साहित्य के आनंद का आधार सुंदर और सत्य है।
4) आनंद को दर्शाना और आनंद को उत्पन्न करना ही साहित्य का उद्देश्य है।
5) जीवन परमात्मा की सृष्टि है इसीलिए वह सुबोध है, सुगम है और मर्यादाओं से परिमित

13) विनय का अभाव एक प्रकार का खोखलापन प्रकट करता है। जिन लोगों में कोई श्लाघनीय गुण नहीं होता, वे अपनी ऐंठ और डाँट-फटकार से लोगों पर प्रभाव जमाते हैं, किंतु गुणवानों को इनकी आवश्यकता नहीं। उनका प्रभाव तो स्वतः सिद्ध है। यदि विनयशील मनुष्य का समाज में प्रभाव थोड़ा हो, तो विनयशील मनुष्य का दोष नहीं; यह समाज का दोष है। इसके अतिरिक्त प्रेम का प्रभाव चाहे थोड़ा हो, पर दबाव के प्रभाव की अपेक्षा, वह चिरस्थायी होता है। यदि थोड़ी देर के लिए मान भी लिया जाए कि विनय सब स्थानों में काम नहीं देती – जैसे शत्रु के सम्मुख, तथापि हमें वह कहना पड़ेगा कि विनयशील पुरुष को ऐसे अवसर कम आएँगे कि जब अपनी विनय के कारण दुखद अनुभव करना पड़े। विनय के साथ निरभिमानता, मानव जाति का आदर, सहनशीलता, धैर्य आदि अनेक सद्गुण लगे हुए हैं।

प्रश्नः
1) विनय के साथ जुड़े अन्य सद्गुण कौन-से हैं?
2) प्रेम तथा दबाव के प्रभाव में क्या अंतर है?
3) विनय किन-किन स्थानों पर प्रभावशाली नहीं होता?
4) विनय का अभाव क्या प्रकट करता है?
5) उपर्युक्त गद्यांश का उचित शीर्षक दीजिए।
उत्तरः
1) विनय के साथ निरभिमानता, मानव जाति का आदर, सहनशीलता, धैर्य आदि सद्गुण जुड़े हुए हैं।
2) प्रेम का प्रभाव थोड़ा होने पर भी चिरस्थायी होता है जबकि दबाव का प्रभाव असीमित होने पर भी क्षणभंगुर होता है।
3) विनय शत्रु के सम्मुख प्रभावशाली नहीं होता।
4) विनय का अभाव एक तरह का खोखलापन प्रकट करता है।
5) ‘विनय का महत्व’।

14) लोकमान्य तिलक का कथन है – “मैं नरक में भी पुस्तकों का स्वागत करूँगा, क्योंकि इनमें वह शक्ति है कि जहाँ वे होंगी, वहाँ अपने आप स्वर्ग बन जाएगा।” श्रेष्ठ पुस्तकें मनुष्य, समाज और राष्ट्र का मार्गदर्शन करती हैं। संसार के इतिहास पर दृष्टिपात करने पर हम देखते हैं कि संसार की अनेक महान विभूतियों पर किसी-न-किसी श्रेष्ठ पुस्तक का प्रभाव पड़ा। महात्मा गाँधी, टालस्टॉय, अब्राहम लिंकन – सभी के जीवन में श्रेष्ठ पुस्तकों का महत्वपूर्ण योगदान था। लेनिन में क्रांति की भावना कार्ल मार्क्स के साहित्य को पढ़कर ही जागी थी। किसी भी जाति के उत्कर्ष या अपकर्ष का लेखा-जोखा उसके साहित्य से पता चलता है। गुप्तकाल को भारतीय इतिहास का ‘स्वर्ण युग’ कहा जाता है क्योंकि उस काल में अत्यंत उत्कृष्ट पुस्तकों की रचना हुई। विचारों के युद्ध में पुस्तकें ही अस्त्र हैं क्योंकि पुस्तकों का हमारे विचारों पर अत्यंत गहरा प्रभाव पड़ता है तथा पुस्तकों के विचार ही समाज की काया पलट कर देते हैं। श्रेष्ठ पुस्तकें मनुष्य को पशु से देवता बनाती है, उसकी सात्विक वृत्तियों को जाग्रत करती हैं तथा उसे असत्य से सत्य की ओर, अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलती हैं।

प्रश्नः
1) लोकमान्य तिलक ने क्यों कहा कि ‘मैं नरक में भी पुस्तकों का स्वागत करूँगा’?
2) लेनिन के मन में क्रांति की भावना किस प्रकार जागी?
3) उपर्युक्त गद्यांश का उचित शीर्षक दीजिए।
4) श्रेष्ठ पुस्तकों का व्यक्ति पर क्या प्रभाव पड़ता है?
5) किन विभूतियों के जीवन में श्रेष्ठ पुस्तकों का योगदान था?
उत्तरः
1) क्योंकि पुस्तकों में वह शक्ति है, जहाँ वे होंगी, वहाँ अपने आप स्वर्ग बन जाएगा।
2) लेनिन में क्रांति की भावना कार्ल मार्क्स के साहित्य को पढ़कर जागी थी।
3) ‘पुस्तक एक सच्चा साथी’। 4) श्रेष्ठ पुस्तकें मनुष्य को पशु से देवता बनाती हैं। उसकी सात्विक वृत्तियों को जागृत करती हैं।
5) महात्मा गांधी, टालस्टॉय, अब्राहम लिंकन एवं लेनिन के जीवन में श्रेष्ठ पुस्तकों का योगदान था।

15) भारत एक महान देश है। विश्व में यही एकमात्र एसा देश है जो इतनी विविधताओं और विभिन्नताओं से परिपूर्ण है। स्थान-स्थान की जलवायु में भी विभिन्नता दिखाई देती है। यहाँ के अनेक धर्मों, विश्वासों, मत-मतांतरों तथा संस्कृतियों के संगम को देखखर इसे ‘अनेकताओं’ का देश कहकर पुकारा गया है। परंतु विभिन्नताएँ होते हुए भी भारत विभाजित नहीं है तथा जीवन के सभी क्षेत्रों में एकता का एक अखंड सूत्र जुड़ा हुआ है। भारत को उस पुष्पहार की संज्ञा दी जाती है जिसमें अनेकानेक रंग-रूप के पुष्पों को एक सूत्र द्वारा पिरोया गया है। हमारी जीवन मीमांसा, रहन-सहन, साहित्य, धार्मिक विश्वास, पूजा-पद्धति, देवी-देवता, तीर्थ स्थान, संगीत भारत की एकता को प्रदर्शित करते हैं। परंतु विदेशियों ने ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति को अपनाकर इस देश पर राज्य किया तथा हम सैकड़ों वर्षों तक गुलामी की जंजीरों में जकड़े रहे। विदेशी शासकों ने बड़ी कूटनीति से हमारी भावनात्मक एकता को खंडित कर दिया। उन्होंने भारतीय संस्कृति से भारतीयों को विमुख करने का जो चक्र चलाया, वह आज भी जारी है। आज भी हम अपनी संस्कृति एवं जीवन दर्शन से दूर होकर पश्चिम की चकाचौंध से प्रभावित होकर अपने जीवन-मूल्यों को भूल बैठे हैं।

KSEEB Solutions

प्रश्नः
1) भारत को अनेकताओं का देश कहकर क्यों संबोधित किया गया है?
2) भारत की उपमा एक पुष्पहार से क्यों दी जाती है?
3) भारत में अनेक प्रकार की विविधताएँ होते हुए भी उसकी एकता किन बातों से प्रकट होती है?
4) पश्चिम की चकाचौंध के कारण हम किसे भूल बैठे हैं?
5) उपर्युक्त गद्यांश का उचित शीर्षक दीजिए।
उत्तरः
1) भारत के अनेक धर्मों, विश्वासों, मत-मतांतरों तथा संस्कृतियों के संगम को देखकर इसे ‘अनेकताओं’ का देश कहकर पुकारा गया है।
2) जैसे रंग बिरंगे पुष्पों को पुष्पहार में पिरोया जाता है वैसे ही भारत भी विभिन्न विविधताओं के होते हुए भी अखण्ड रूप से जुड़ा हुआ है।
3) हमारी जीवन मीमांसा, रहन-सहन, साहित्य, धार्मिक विश्वास, पूजा-पद्धति, देवी-देवता, तीर्थ स्थान, संगीत भारत की एकता को प्रकट करते हैं।
4) पश्चिम की चकाचौंध से प्रभावित होकर हम अपने जीवन मूल्यों को भूल बैठे हैं।
5) ‘अनेकता में एकता’।

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