1st PUC Hindi Textbook Answers Sahitya Vaibhav Chapter 2 युवाओं से

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Karnataka 1st PUC Hindi Textbook Answers Sahitya Vaibhav Chapter 2 युवाओं से

युवाओं से Questions and Answers, Notes, Summary

I. एक शब्द या वाक्यांश या वाक्य में उत्तर लिखिए:

प्रश्न 1.
स्वामी विवेकानंद का विश्वास किन पर है?
उत्तर:
स्वामी विवेकानंद का विश्वास नवीन पीढ़ी के नवयुवकों पर है।

प्रश्न 2.
स्वामी विवेकानंद के अनुसार भारत के राष्ट्रीय आदर्श क्या हैं?
उत्तर:
स्वामी विवेकानंद के अनुसार भारत के राष्ट्रीय आदर्श त्याग और सेवा है।

प्रश्न 3.
कौन सबकी अपेक्षा उत्तम रूप से कार्य करता है?
उत्तर:
निःस्वार्थी व्यक्ति सबकी अपेक्षा उत्तम कार्य करता है।

प्रश्न 4.
किस शक्ति के सामने सब शक्तियाँ दब जाएँगी?
उत्तर:
इच्छाशक्ति के सामने सब शक्तियाँ दब जाएँगी।

प्रश्न 5.
असंभव को संभव बनानेवाली चीज़ क्या है?
उत्तर:
असंभव को संभव बनानेवाली चीज़ प्रेम है।

प्रश्न 6.
जो अपने आपमें विश्वास नहीं करता, वह क्या है?
उत्तर:
जो अपने आप में विश्वास नहीं करता, वह नास्तिक है।

प्रश्न 7.
कमज़ोरी किसके समान है?
उत्तर:
कमजोरी मृत्यु के समान है।

प्रश्न 8.
सबसे पहले हमारे तरुणों को क्या बनना चाहिए?
उत्तर:
सबसे पहले हमारे तरुणों को मजबूत बनना चाहिए।

प्रश्न 9.
प्रत्येक आत्मा क्या है?
उत्तर:
प्रत्येक आत्मा अव्यक्त ब्रह्म है।

प्रश्न 10.
नवयुवकों को किसकी तरह सहनशील होना चाहिए?
उत्तर:
नवयुवकों को पृथ्वी की तरह सहनशील होना चाहिए।

अतिरिक्त प्रश्नः

प्रश्न 11.
किसका पुनरुत्थान होगा?
उत्तर:
भारतवर्ष का पुनरुत्थान होगा।

प्रश्न 12.
क्या धीरे-धीरे दूर हो रही है?
उत्तर:
जड़ता धीरे-धीरे दूर हो रही है।

प्रश्न 13.
‘युवाओं से’ पाठ के लेखक कौन है?
उत्तर:
‘युवाओं से’ पाठ के लेखक स्वामी विवेकानंद है।

प्रश्न 14.
प्रत्येक व्यक्ति को कैसे उपयुक्त बनाया जा सकता है?
उत्तर:
प्रत्येक व्यक्ति को शिक्षा के द्वारा उपयुक्त बनाया जा सकता है।

प्रश्न 15.
भय किसका कारण बनता है?
उत्तर:
भय ही पतन तथा पाप का कारण बनता है।

प्रश्न 16.
हमारे स्वभाव में किसका अभाव है?
उत्तर:
हमारे स्वभाव में संगठन का सर्वथा अभाव है।

II. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लिखिएः

प्रश्न 1.
भारतवर्ष का पुनरुत्थान कैसे होगा?
उत्तर:
स्वामी विवेकानंद के अनुसार भारत का पुनरुत्थान शारीरिक शक्ति से नहीं, बल्कि आत्मिक शक्ति से होगा। वह उत्थान विनाश की ध्वजा से नहीं, बल्कि शांति और प्रेम की ध्वजा से होगा। हमारी यह वृद्ध भारत माता पुनः एक बार जाग्रत होकर अपने सिंहासन पर पूर्ण वैभवता के साथ विराजमान होगी।

प्रश्न 2.
त्याग और सेवा के बारे में स्वामी विवेकानंद जी के क्या विचार हैं?
उत्तर:
स्वामी विवेकानंद के अनुसार “भारत के राष्ट्रीय आदर्श हैं- त्याग और सेवा। तुम काम में लग जाओ, फिर देखोगे इतनी शक्ति आयेगी कि तुम उसे सँभाल नहीं सकोगे। दूसरों के प्रति सोचने से व काम करने से भीतर की शांति जाग उठती है और धीरे-धीरे हृदय में सिंह का-सा बल आ जाता है। दुखियों का दर्द समझो और ईश्वर से सहायता की प्रार्थना करो। प्रतिज्ञा करो कि अपना सारा जीवन लोगों के उद्धार कार्य में लगा देंगे।”

प्रश्न 3.
स्वदेश-भक्ति के बारे में स्वामी विवेकानंद जी का आदर्श क्या है?
उत्तर:
स्वदेशभक्ति के बारे में स्वामीजी कहते हैं- बड़े काम करने के लिए तीन चीजों की आवश्यकता होती है- बुद्धि, विचारशक्ति और हृदय की महाशक्ति। अतः युवकों को चाहिए कि वे हृदयवान बने। यदि युवकों ने जान लिया है कि भारत के अपने गरीब, दीन-बन्धुओं की कई समस्याएँ हैं, तो समझ लो कि यही देशभक्ति की प्रथम सीढ़ी है। देशभक्ति का पहला पाठ है- स्वदेश-हितैषी होना। “उठो, जागो और तब-तक रुको नहीं, जब-तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाय।”

प्रश्न 4.
सर्व धर्म सहिष्णुता के बारे में स्वामी विवेकानंद जी के विचार लिखिए।
उत्तर:
सर्व धर्म सहिष्णुता के बारे में स्वामीजी का विचार है- मैं सभी धर्मों को स्वीकार करता हूँ। और उन सबकी पूजा करता हूँ। मैं उनमें से प्रत्येक के साथ ईश्वर की उपासना करता हूँ। वे स्वयं चाहे किसी भी रूप में उपासना करते हो, मैं मुसलमानों की मस्जिद में जाऊँगा, मैं ईसाइयों के गिरिजा में क्रास के सामने घुटने टेककर प्रार्थना करूँगा, मैं बौद्धमंदिरों में जाकर बुद्ध और उनकी शिक्षा की शरण लूँगा। मैं जंगल में जाकर हिन्दुओं के साथ ध्यान करूँगा, जो हृदयस्थ ज्योतिस्वरूप परमात्मा को प्रत्यक्ष करने में लगे हुए हैं।

प्रश्न 5.
शिक्षा के बारे में स्वामी विवेकानंद जी क्या कहते हैं?
उत्तर:
स्वामी विवेकानंदजी के अनुसार – शिक्षा विविध जानकारियों का ढेर नहीं है, जो तुम्हारे मस्तिष्क में ढूंस दिया गया है और जो आत्मसात हुए बिना वहाँ आजन्म पड़ा रहकर गड़बड़ मचाया करता हैं। हमें उन विचारों की अनुभूति करनी चाहिए, जो जीवन-निर्माण तथा चरित्र-निर्माण में सहायक हों। यदि केवल पाँच ही परखे हुए विचार आत्मसात् कर उनके अनुसार अपने जीवन और चरित्र का निर्माण कर लेते हैं, तो हम पूरे ग्रंथालय को कंठस्थ करनेवाले की अपेक्षा अधिक शिक्षित हैं।

अतिरिक्त प्रश्नः

प्रश्न 6.
‘युवाओं से’ पाठ के आधार पर भारत की महानता क्या है?
उत्तर:
विवेकानन्द कहते हैं, भारत वर्ष का उत्थान होगा। यह उत्थान शारीरिक शक्ति का नहीं बल्कि आत्मा की शक्ति के द्वारा होगा। अर्थात् भारत अपने वैभव को, गौरवशाली अतीत को पुनः प्राप्त करेगा। यह उत्थान, यह प्रगति, शांति और प्रेम के रास्ते पर चलकर होगी। विवेकानंद कहते हैं कि भारत अब नींद से जाग रहा है। भारत के राष्ट्रीय आदर्श ही त्याग और सेवा है।

प्रश्न 7.
वीर युवकों के लिए स्वामी विवेकानंद जी क्या कहते हैं?
उत्तर:
विवेकानंद युवाओं को कहते हैं- उठो, जागो, स्वयं जगकर औरों को जगाओं। मेरे तरुण मित्रों शक्तिशाली बनो, मेरी तुम्हें यही सलाह है। तुम अध्ययन से पहले मजबूत बनो। शारीरिक रूप से मजबूत बनों। एक विचार को लो। फिर उसी विचार के अनुसार अपने जीवन को बनाओं। उसी के बारे में सोचो। उसी का सपना देखों। यही सफलता का रास्ता है। मरते दम तक गरीबों और पददलितों के लिए कार्य करों। प्रतिज्ञा करों कि अपना सारा जीवन इन तीस करोड़ लोगों की भलाई के लिए लगा दोगे।

प्रश्न 8.
‘युवाओं से’ पाठ में स्वामी विवेकानंद ‘आध्यात्म, अव्यक्त ब्रह्म, धर्म’ के बारे में क्या कहते हैं?
उत्तर:
विवेकानंद कहते हैं कि प्रत्येक आत्मा ही अव्यक्त ब्रह्म है। बाहरी और आन्तरिक मन को संतुलित कर, इस अन्तर्निहित ब्रह्म को, इस आत्मिक ब्रह्म को अभिव्यक्त करना ही जीवन का उद्देश्य है। वे कहते हैं- कर्म, भक्ति एवं योग इनमें से किसी एक या सबके सम्मिलन से इस ध्येय को, उद्देश्य को प्राप्त कर लो और मुक्त हो जाओं। यही धर्म का सार है। विभिन्न मत, विधि तथा अनुष्ठान, गंध, मंदिर – ये सब गौण हैं। ढोंगी बनने की अपेक्षा नास्तिक बनना अच्छा है।

III. निम्नलिखित वाक्य किसने किससे कहा?

प्रश्न 1.
“मेरी आशा, मेरा विश्वास नवीन पीढ़ी के नवयुवकों पर है।”
उत्तर:
विवेकानंद ने नवयुवकों से कहा।

प्रश्न 2.
“तुम तो ईश्वर के संतान हो, अमर आनंद के भागी हो, पवित्र और पूर्ण आत्मा हो।’
उत्तर:
विवेकानंद ने नवयुवकों से कहा।

प्रश्न 3.
“प्रत्येक आत्मा ही अव्यक्त ब्रह्म है।”
उत्तर:
विवेकानंद ने नवयुवकों से कहा।

IV. ससंदर्भ स्पष्टीकरण कीजिएः

प्रश्न 1.
‘यह याद रखो कि तुम स्वयं अपने भाग्य के निर्माता हो।
उत्तर:
प्रसंग : प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक ‘साहित्य वैभव’ के ‘युवाओं से’ नामक पाठ से लिया गया है। इसके लेखक स्वामी विवेकानंद हैं।
संदर्भ : प्रस्तुत वाक्य को स्वामी विवेकानंद जी नवयुवकों को मार्गदर्शन देते हुए अपने भाषण में कहते है।
स्पष्टीकरण : स्वामी विवेकानंद कहते है कि युवा दुर्बल नहीं हैं। वे सब ईश्वर की संतान हैं, उनकी आत्मा पवित्र और पूर्ण है। वे स्वयं अपने भाग्य के निर्माता हैं। उनका बल उन्ही के भीतर है। इन शब्दों द्वारा वे युवकों को राष्ट्र निर्माण की प्रेरणा दे रहे हैं।

प्रश्न 2.
‘उठो, जागो और तब तक रुको नहीं, जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए।
उत्तर:
प्रसंग : प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक ‘साहित्य वैभव’ के ‘युवाओं से’ नामक पाठ से लिया गया है। इसके लेखक स्वामी विवेकानंद हैं।
संदर्भ : प्रस्तुत वाक्य में स्वामी विवेकानंद जी ने नवयुवकों को सम्बोधित करते हुए कहते हैं कि अज्ञानता से जागकर, देश को आगे बढ़ाने के लक्ष्यपथ पर तेजी से बढ़ना है।
स्पष्टीकरण : यह उद्घोष स्वामी जी के सभी उपदेशों में श्रेष्ठ माना जाता है। कार्य करने के लिए बुद्धि, विचार और हृदय की आवश्यकता है। साथ-साथ प्रेम से असंभव भी संभव हो जाता है। अतः उठो, जागो और अपने स्वरूप को पहचानो, आगे बढ़ो, सफल होने तक बढ़ो।

प्रश्न 3.
‘भय से ही दुःख होता है, यह मृत्यु का कारण है तथा इसी के कारण सारी बुराई तथा पाप – होता है।
उत्तर:
प्रसंग : प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक ‘साहित्य वैभव’ के ‘युवाओं से’ नामक पाठ से लिया गया है। इसके लेखक स्वामी विवेकानंद हैं।
संदर्भ : स्वामी विवेकानंद नवयुवकों को जागृत करते हुए कहते हैं कि भय से मनुष्य दुर्बल बन जाता है और वही उसके पतन का कारण होता है।
स्पष्टीकरण : युवा पीढ़ी को स्वामीजी हिम्मत देते हुए कहते हैं कि तुम्हें कमजोर, भयभीत नहीं होना चाहिए। निर्भीकता से ही किसी राष्ट्र की उन्नति साध्य है। भय ही. मृत्यु का कारण बनता है और इसी से पाप का जन्म होता है।

प्रश्न 4.
‘ढोंगी बनने की अपेक्षा स्पष्ट रूप से नास्तिक बनना अच्छा है।’
उत्तर:
प्रसंग : प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक ‘साहित्य वैभव’ के ‘युवाओं से’ नामक पाठ से लिया गया है। इसके लेखक स्वामी विवेकानंद हैं।
संदर्भ : स्वामी विवेकानंद नवयुवकों को उद्बोधित करते हुए कहते हैं कि धर्म में अंधविश्वास रखनेवालों से बेहतर नास्तिक हैं।
स्पष्टीकरण : ईश्वर की भक्ति सच्चे मन से, विश्वास के साथ करनी चाहिए। दिखावटी या ढोंगी भक्ति से तो नास्तिक बनना बेहतर है। स्वामीजी के ये विचार हैं।

प्रश्न 5.
‘मैं तुम सबसे यही चाहता हूँ कि तुम आत्मप्रतिष्ठा, दलबंदी और ईर्ष्या को सदा के लिए छोड़ दो।’
उत्तर:
प्रसंग : प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक ‘साहित्य वैभव’ के ‘युवाओं से’ नामक पाठ से लिया गया है। इसके लेखक स्वामी विवेकानंद हैं।
संदर्भ : प्रस्तुत वाक्य में स्वामी विवेकानंद ने कहा है कि स्वार्थ भावना को त्यागकर उचित मार्ग पर चलना अनिवार्य है।
स्पष्टीकरण : स्वामीजी के अनुसार संगठन के लिए जो बातें चाहिए, आज उनका अभाव है। वास्तव में देशभक्तों की एकता के लिए आपसी ईर्ष्या, द्वेष, अहंकार – ये सारी बातें नहीं होनी चाहिए। इनसे एकता में बाधा पहुँचती है।

अतिरिक्त प्रश्नः

प्रश्न 6.
“शक्ति ही जीवन और कमज़ोरी ही मृत्यु है।”
उत्तर:
प्रसंग : प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक ‘साहित्य वैभव’ के ‘युवाओं से’ नामक पाठ से लिया गया है। इसके लेखक स्वामी विवेकानंद हैं।
संदर्भ : विवेकानंद कहते है शक्ति जीवन का ही दूसरा नाम है। वे युवाओं को शक्तिवान होने का संदेश देते हैं।
स्पष्टीकरण : विवेकानंद कहते हैं कि शक्ति परम सुख है। शक्ति आपको गर्वित करती है। वह आपमें आत्मविश्वास, स्वाभिमान का संचार करती है। कमजोर होना, कायर होने का स्वभाव है। कायरता या कमजोरी कभी न हटने वाला बोझ और मानसिक यंत्रणा है। वे कहते हैं कमजोरी मृत्यु के समान है और शक्ति ही जीवन है।

V. विलोम शब्द लिखिए:

प्रश्न 1.
आशा, साधारण, स्वदेश, स्वार्थी, कीर्ति, शिक्षित, पवित्र, जन्म, निर्धन, मजबूत, धर्म, नास्तिक।
उत्तरः

  • आशा × निराशा
  • साधारण × असाधारण
  • स्वदेश × विदेश
  • स्वार्थी × निस्वार्थी
  • कीर्ति × अपकीर्ति
  • शिक्षित × अशिक्षित
  • पवित्र × अपवित्र
  • जन्म × मरण (मृत्यु)
  • निर्धन × धनवान
  • मजबूत × कमजोर
  • धर्म × अधर्म
  • नास्तिक × आस्तिक

VI. समानार्थक शब्द लिखिए:

प्रश्न 1.
नवीन, पुरोहित, जंगल, पहाड़, ईश्वर, साहस, तरुण, अधिक।
उत्तरः

  • नवीन – नया
  • पुरोहित – पुजारी
  • जंगल – वन
  • पहाड़ – पर्वत
  • ईश्वर – भगवान
  • साहस – हिम्मत, बहादुरी
  • तरुण – युवक
  • अधिक – ज्यादा

VII. निम्नलिखित अनुच्छेद पढ़कर उस पर आधारित प्रश्नों के उत्तर लिखिए:

हमेशा बढते चलो। मरते दम तक गरीबों और पददलितों के लिए सहानुभूति – यही हमारा आदर्श वाक्य है। वीर युवकों! बढ़े चलो! ईश्वर के प्रति आस्था रखो। किसी चालबाज़ी की आवश्यकता नहीं, उससे कुछ नहीं होता। दुखियों का दर्द समझो और ईश्वर से सहायता की प्रार्थना करो – वह अवश्य मिलेगी। युवको! मैं गरीबों, मूों और उत्पीडितों के लिए इस सहानुभूति और प्राणपण प्रयत्न को थाती के तौर पर तुम्हें अर्पण करता हूँ। प्रतिज्ञा करो कि अपना सारा जीवन इन तीस करोड़ लोगों के उद्धार-कार्य में लगा दोगे, जो दिनोंदिन अवनति के गर्त में गिरते जा रहे हैं। यदि तुम सचमुच मेरी संतान हो, तो तुम किसी वस्तु से न डरोगे, न किसी बात पर रुकोगे। तुम सिंहतुल्य होंगे। हमें भारत को और पूरे संसार को जगाना है।

प्रश्न 1.
हमारा आदर्श वाक्य क्या है?
उत्तरः
मरते दम तक गरीबों और पददलितों के लिए सहानुभूति – यही हमारा आदर्श वाक्य है।

प्रश्न 2.
किसके प्रति आस्था रखनी चाहिए?
उत्तरः
ईश्वर के प्रति आस्था रखनी चाहिए।

प्रश्न 3.
किसकी आवश्यकता नहीं है?
उत्तरः
किसी चालबाजी की आवश्यकता नहीं है।

प्रश्न 4.
तुम किसके समान होगे?
उत्तरः
तुम सिंह के समान होगे।

प्रश्न 5.
हमें किसे जगाना है?
उत्तरः
हमें भारत को और पूरे संसार को जगाना है।

युवाओं से लेखक परिचयः

युगपुरुष स्वामी विवेकानन्दजी का जन्म 12 जनवरी 1863 को कलकत्ता में हुआ था। इनके बचपन का नाम था नरेन्द्रनाथ दत्त। पिता का नाम विश्वनाथ दत्त, माता का नाम भुवनेश्वरी देवी। बचपन से ही आप बहुत ही प्रभावशाली, गरीबों के प्रति दयापूर्ण हृदय रखनेवाले और भक्ति एवं वेदान्त में रुचि रखनेवाले थे। श्रीरामकृष्ण परमहंस आपके गुरु थे।

सितंबर 1893 में अमेरिका के चिकागों नगर में आयोजित ‘सर्व धर्म सम्मेलन’ में हिन्दू धर्म, भक्ति और वेदान्त के बारे में स्वामीजी ने जो भाषण दिया वह अद्वितीय था। आपकी मुख्य कृतियाँ हैं – ‘कर्मयोग’, ‘भगवान कृष्ण और भगवद्गीता’, ‘मेरे गुरुदेव’ आदि। आपकी मृत्यु 4 जुलाई 1902 को हुई।
प्रस्तुत भाग में स्वामी विवेकानन्दजी ने नवयुवकों का मार्गदर्शन किया है। विवेकानन्दजी का विश्वास था कि देश का उद्धार केवल नवयुवक एवं नवयुवतियों के द्वारा ही संभव हैं।

युवाओं से Summary in Hindi

स्वामी विवेकानन्द आधुनिक भारत के निर्माताओं में एक थे। उन्होंने पहचान लिया था कि युवाओं से ही आधुनिक भारत बन सकता है। इसलिए उन्होंने युवाओं को देश की वर्तमान दुःस्थिति से परिचित कराया। फिर उन्होंने प्रबुद्ध और संपन्न भारत की तस्वीर खींची। उन्होंने युवा-पीढ़ी को अपना कर्तव्य समझाया।

भारत एक जमाने में शिक्षा, संपत्ति तथा ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्रों में बहुत आगे था। लेकिन विदेशी आक्रमणकारियों, शासकों तथा स्वदेशी राजाओं के आपसी द्वेष के कारण, भारत पिछड़ा हुआ था। अब उन्होंने भारत के विगत वैभव को फिर लाने का संकल्प किया। स्वामी विवेकानंद का दृढ़ विश्वास है कि भारत का भविष्य उज्ज्वल होगा और वह केवल युवा पीढ़ी के द्वारा। इस दृष्टि से उन्होंने युवाओं को इस तरह संबोधित किया।

भारतवासियों में अनेक किसान, मजदूर और बेरोजगार हैं। पढ़े-लिखे लोग और अनपढ़ भी निराश होकर घर में बैठे हैं। हमें उनको जगाना है, उन्हें शिक्षित करना है, उन्हें क्रियाशील बनाना है। उन्हें पहले रोटी, कपड़ा और मकान का प्रबंध करने का मार्ग दिखाना है। हर एक भारतीय में सिंह सोया हुआ है। इसलिए युवाओं को गाँव-गाँव जाकर सोये हुए लोगों को जगाना है। हमें केवल अपना स्वार्थ ही नहीं देखना है। जब तक भारत में एक भी दरिद्र व्यक्ति रहेगा, तब-तक इसकी उन्नति नहीं होगी। इसलिए हमें अपना स्वार्थ भुलाकर, सारी जनता की भलाई के बारे में सोचना है। भारत में कई धर्मों के लोग हैं। हमें धर्म के नाम पर लड़ना नहीं चाहिए। हमें जाति और धर्म को भुलाकर देश की आजादी के लिए एकजुट होकर लड़ना चाहिए।

हमें प्रेम, दया, करुणा तथा सहानुभूति आदि गुणों को सीखकर आचरण में लाना चाहिए। अज्ञान के अंधेरे से बाहर निकलना चाहिए और उजाले की ओर कदम बढ़ाना चाहिए। भारत देश के पिछड़ेपन के कई कारण हैं जैसे – अशिक्षा, अज्ञान, आलस्य, ईर्ष्या, निराशा आदि। हमें सर्व प्रथम इन कमजोरियों पर विजय पानी है। विजय पाने का हमें संकल्प करना चाहिए। बाद में कर्मपथ पर निडर होकर आगे बढ़ना चाहिए। इसलिए हमारा मूलमंत्र यह होना चाहिए – “उठो, जागो और रुको नहीं मंजिल पहुँचाने तक|”

भारत की युवा पीढ़ी को चरित्रवान बनना चाहिए। शारीरिक और मानसिक रूप से मजबूत होना चाहिए। निस्वार्थ भाव से जनता-जनार्दन की सेवा करनी चाहिए। स्वामी विवेकानंद ने युवाओं को देश की रीढ़ कहा है, जो शत-प्रतिशत सच है।

युवाओं से Summary in Kannada

1st PUC Hindi Textbook Answers Sahitya Vaibhav Chapter 2 युवाओं से 1
1st PUC Hindi Textbook Answers Sahitya Vaibhav Chapter 2 युवाओं से 2

युवाओं से Summary in English

In this lesson, Swami Vivekananda addresses the youth of the country, because he believed that the development of our country was possible only through the youth.
Swami Vivekananda was one of the architects of modern India. He had recognized that only the youth could make India modern. Therefore, he endeavoured to familiarize the youth with the disorder and the mismanaged state of affairs in the country. He tried to explain to the youth their responsibilities.

There was a time when India was a frontrunner in the fields of education, wealth, knowledge and science. However, due to foreign invaders, and the frequent bickerings between native kings, India remained backwards. Swami Vivekananda wanted to restore the lost splendour of our country. He strongly believed that India had a bright future, and it depended on the youth. With this vision, he hails the youth of India.

Among the citizens of India, there are farmers, labourers and unemployed people. The educated and uneducated alike are sitting at home, disheartened. We have to rouse them, educate them, and make them hardworking. They have to be shown the way to earn their basic needs – food, clothing and shelter. There is a lion sleeping within every Indian. Therefore, the youth have to travel to the villages and wake up these sleeping people. We must not heed our selfishness. As long as there is even one poor person in India, there will be no development. Hence, we must forget our selfishness and think about the welfare of all the people of India. India is inhabited by people of different religions. We must not fight in the name of religion. We must forget differences of caste and religion, and focus on fighting for independence as one entity.

We must learn and practice values such as love, mercy, compassion and sympathy towards our fellow citizens. We must emerge from the shadow of ignorance and step towards brightness. There are many reasons for the backwardness of our country, such as – illiteracy, ignorance, laziness, envy, disappointment and jealousy among others. First and foremost, we must win over these weaknesses. We must make a firm decision to win over them. Then we must walk on the path of righteousness without any fear. Therefore, our motto must be – “Awake, arise and stop not until the goal is reached.”

India’s youth must have good moral character and conduct. They must become strong, both mentally and physically. They must serve the people of the country selflessly. Swami Vivekananda has térmed the youth as the backbone of the country.

कठिन शब्दार्थः

  • सिंह विक्रम – सिंहबल;
  • अनुष्टेय – आचरणीय;
  • पुनरुत्थान – पुनः उन्नति;
  • प्रतारणा – धूर्तता;
  • पाशविक – मृगीय;
  • उत्पीड़ित – सताए हुए;
  • थाती – धरोधर; अमानत;
  • गर्त – गड्ढ़ा;
  • नियतन – निर्धारित करना, आवंटन करना;
  • वीर्यवान – साहसी, तेजोवान;
  • गिरिजा – चर्च;
  • उन्मत्तता – पागलपन;
  • अवनति – विनाश;
  • अस्थि – माँस;
  • भुजवा – भड जा;
  • चालबाजी – धोखेबाजी;
  • आच्छन्न – घेर लेना।

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